तुम्हारा परिणाम तुम्हारी कहानी का केवल एक पन्ना है, पूरी किताब नहीं।
यदि अच्छी रैंक आ जाए, तो विनम्रता के साथ आगे बढ़ो। यदि मनचाही रैंक न आए, तब भी आगे बढ़ो। क्योंकि जीवन अंततः उन्हीं लोगों को याद रखता है जो ठोकर खाने के बाद भी उठ खड़े होते हैं, जो असफलताओं को अपनी पहचान नहीं बनने देते।
इसलिए परिणाम आने से पहले स्वयं से एक छोटा-सा वादा करो—
चाहे जो भी परिणाम आए, मैं अपना आत्मसम्मान नहीं खोऊँगा।
मेडिकल कॉलेज कोटा के वरिष्ठ मनोचिकित्सक एवं राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के जिला नोडल अधिकारी डॉ. विनोद कुमार दड़िया का कहना है कि जेईई और नीट जैसी परीक्षाओं के परिणाम विद्यार्थियों की संपूर्ण क्षमता, व्यक्तित्व और भविष्य का अंतिम मूल्यांकन नहीं होते।
Listen to Dr. Vinod Kumar Dadiya
जीवन में हमें ऐसे लोग मिलते हैं जो हमारे संघर्ष को थोड़ा हल्का कर देते हैं—माता-पिता, शिक्षक, मित्र और शुभचिंतक। लेकिन अंततः यात्रा हमें स्वयं ही पूरी करनी होती है।
मेरे प्यारे बच्चों, आप सभी ने कक्षा 10 की अंग्रेजी की पाठ्यपुस्तक में “His First Flight कहानी पढ़ी होगी, जिसे Liam O’Flaherty ने लिखा है। आपको वह छोटा सीगल याद होगा जो उड़ने से डरता था। उसके भाई-बहन उड़ना सीख चुके थे, लेकिन वह भय के कारण चट्टान पर बैठा रहा। तब उसकी माँ ने उसे भोजन का लालच देकर उड़ने के लिए प्रेरित किया। जैसे ही उसने साहस करके छलांग लगाई, उसके पंख फैल गए और वह उड़ने लगा। तब उसे पता चला कि उड़ने की क्षमता तो उसके भीतर पहले से ही थी। परीक्षा परिणाम के बाद कई छात्र भी उसी सीगल की तरह डर महसूस करते हैं। उन्हें असफलता का भय होता है, दोस्तों से पीछे रह जाने की चिंता होती है और भविष्य अनिश्चित दिखाई देता है। यह स्वाभाविक है।

लेकिन असफलता जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नया मोड़ है। जैसे सीगल को अपनी शक्ति का एहसास तभी हुआ जब उसने डर के बावजूद छलांग लगाई, वैसे ही विद्यार्थी भी चुनौतियों का सामना करके अपनी वास्तविक क्षमता को पहचानते हैं।
परिणाम एक पड़ाव है, मंज़िल नहीं
ठोकरें अंत नहीं, एक नई शुरुआत हैं।
हर यात्रा में कुछ लोग आगे निकल जाते हैं और कुछ पीछे रह जाते हैं। लेकिन दूसरों की गति देखकर अपनी यात्रा रोक देना बुद्धिमानी नहीं है। सफलता अंततः उसी को मिलती है जो अपनी क्षमता, अपने स्वभाव और अपनी परिस्थितियों के अनुसार निरंतर आगे बढ़ता रहता है। कछुए और खरगोश की प्रसिद्ध कहानी भी इसी सत्य को सरलता से समझाती है। तेज होना हमेशा जीत की गारंटी नहीं होता और धीमा होना हार का प्रमाण नहीं। जीत अक्सर उसी की होती है जो बिना रुके, बिना घबराए और बिना तुलना में उलझे अपने रास्ते पर चलता रहता है। जीवन कोई दौड़ नहीं है जहाँ सबको एक ही समय पर मंजिल तक पहुँचना हो।
इसी दौरान मेरी बातचीत जानी-मानी करियर काउंसलर दुहीता आर्या से हुई। उन्होंने बताया कि वे विद्यार्थियों को उनकी वास्तविक रुचियों को पहचानने, सही करियर का चयन करने, मजबूत प्रोफाइल बनाने तथा भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों की प्रवेश प्रक्रियाओं को समझने और पूरा करने में मार्गदर्शन देती हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से सीधे संवाद करते हुए कहा “मैं उन सभी विद्यार्थियों से एक महत्वपूर्ण बात कहना चाहती हूँ जो जेईई और नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता न मिलने के कारण स्वयं को टूटा हुआ या निराश महसूस कर रहे हैं। कोई एक परीक्षा आपकी बुद्धिमत्ता, आपकी प्रतिभा या आपके भविष्य का निर्धारण नहीं कर सकती। दुर्भाग्यवश अनेक विद्यार्थी यह मान बैठते हैं कि यदि वे इन परीक्षाओं में सफल नहीं हो पाए तो उनकी जिंदगी का रास्ता यहीं समाप्त हो जाता है। लेकिन सच्चाई यह है कि परीक्षाएँ केवल एक रास्ता है, पूरी मंजिल नहीं। सफलता किसी एक परीक्षा से कहीं अधिक बड़ी होती है। आज की दुनिया अवसरों से भरी हुई है। इंजीनियरिंग और चिकित्सा के अलावा डिजाइन, विधि, मनोविज्ञान, डेटा साइंस, व्यवसाय, संचार और अनेक अन्य क्षेत्रों में शानदार करियर विकल्प उपलब्ध हैं। दुनिया के कई सफल व्यक्तियों ने अपने जीवन में असफलताओं का सामना किया, महत्वपूर्ण परीक्षाओं में सफलता नहीं पाई या फिर अपने करियर की दिशा बदलकर नई ऊँचाइयाँ हासिल की।
दुहीता आर्या का मानना है कि सबसे अधिक महत्वपूर्ण कोई एक परिणाम नहीं, बल्कि सीखते रहने, आगे बढ़ते रहने और स्वयं को बेहतर बनाने की इच्छा है। “कई बार असफलता रुकने का संकेत नहीं देती, बल्कि वह आपको उस दिशा की ओर ले जाती है जो आपकी क्षमताओं और रुचियों के अधिक अनुकूल होती है ।”
यह एक यात्रा है, और इस यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण बात दूसरों से आगे निकलना नहीं, बल्कि अपने कदमों को निरंतर चलते रखना है। इसी संदर्भ में मेडिकल कॉलेज कोटा के वरिष्ठ मनोचिकित्सक एवं राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के जिला नोडल अधिकारी डॉ. विनोद कुमार दड़िया का कहना है कि जेईई और नीट जैसी परीक्षाओं के परिणाम विद्यार्थियों की संपूर्ण क्षमता, व्यक्तित्व और भविष्य का अंतिम मूल्यांकन नहीं होते। परीक्षा में अपेक्षित सफलता न मिलने पर उत्पन्न होने वाली निराशा, तनाव और हीन भावना को मन में दवाने की बजाय परिवार, शिक्षकों, मित्रों और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के साथ साझा करना चाहिए। उन्होंने विद्यार्थियों से अपने जीवन को अमूल्य मानते हुए किसी भी प्रकार की मानसिक परेशानी की स्थिति में सहायता लेने में संकोच न करने की अपील की। आवश्यकता पड़ने पर टेली-मानस (Tele-MANAS) सेवा की सहायता भी ली जा सकती है। गूगल पर Tele-MANAS सर्च करके इसकी जानकारी और सहायता प्राप्त की जा सकती है। डॉ. दड़िया की एक बात विशेष रूप से प्रेरित करती है “जिस प्रकार मजबूत जड़ों वाला वृक्ष आंधी-तूफान में भी दृढ़ता से खड़ा रहता है, उसी प्रकार जीवन के अनुभव हमें भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के योग्य बनाते हैं।
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