कोटा का अर्बन रीसेट: नीति आयोग के वैज्ञानिक विजन और धरातल के कंक्रीट का अंतर्द्वंद्व
• अमिता शर्मा
प्रस्तावना: कोचिंग नगरी से शहरी प्रयोगशाला तक
दशकों से मेडिकल और इंजीनियरिंग की प्रतियोगी परीक्षाओं के शानदार नतीजों ने कोटा को देश की ‘कोचिंग नगरी’ के रूप में एक विशिष्ट पहचान दी है।
लेकिन आज यह शहर एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है जहाँ इसकी सफलता केवल परीक्षाओं के नतीजों से नहीं, बल्कि इसके शहरी नियोजन (Urban Planning) के भविष्य से तय होगी। नीति आयोग की 2021 की रिपोर्ट ‘रिफॉर्म्स इन अर्बन प्लानिंग कैपेसिटी इन इंडिया’ इस बदलाव के लिए एक ‘बाइबल’ मानी जाती है, जो कोटा के ‘अर्बन रीसेट’ (शहरी पुनर्गठन) के लिए एक वैज्ञानिक खाका प्रदान करती है।

1. डिजिटल डीएनए और डेटा सिंकिंग की विफलता
विजन: शहर का एक ‘डिजिटल डीएनए’ या ‘डिजिटल ट्विन’ (शहर का हूबहू कंप्यूटर मॉडल) तैयार होना था। इसका उद्देश्य निर्माण से पहले थ्री-डी सिमुलेशन के जरिए यातायात और ढांचे का पूर्वाभ्यास करना था।
हकीकत: कोटा स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में विभिन्न विभागों (यूआईटी, नगर निगम, पीडब्ल्यूडी) के बीच सूचनाओं के आपसी तालमेल (डेटा सिंकिंग) की भारी कमी रही। बिना डिजिटल अलाइनमेंट के बने फ्लाईओवर्स और एरोड्रम सर्किल जैसे क्षेत्रों में ‘टेढ़े-मेढ़े’ (Zig-Zag) रास्तों की डिज़ाइन इसका परिणाम हैं। इन फ्लाईओवर्स के कारण एक नई समस्या जन्म ले रही है—ओवरस्पीडिंग।

फ्लाईओवर पर खुली सड़क देखकर लोगों को लगता है कि ‘ऊपर तो कुछ भी नहीं होगा’ (कोई सीधा खतरा नहीं है), और वे इतनी तेज गति से गाड़ियां चलाते हैं कि भयंकर दुर्घटनाओं की आशंका कई गुना बढ़ जाती है। इसके अलावा, एक बड़ी खामी यह भी सामने आई है कि ये फ्लाईओवर लंबी दूरी के सफर या शहर को पार करने वालों के लिए तो सार्थक साबित हुए हैं, लेकिन शहर के अंदर का लोकल ट्रैफिक आज भी जस का तस फंसा हुआ है।
यदि निर्माण से पहले सिमुलेशन का उपयोग होता, तो इन व्यावहारिक समस्याओं को पहले ही सुलझाया जा सकता था।
2. टीओडी (TOD), ‘हीट कैन्यन’ और मानसिक स्वास्थ्य का संकट
विजन: नीति आयोग ने ट्रांजिट-ओरिएंटेड डेवलपमेंट (TOD) का सुझाव दिया था—यानी सुरक्षित और सुलभ पैदल रास्तों वाली सघन बसावट जहाँ छात्र आसानी से आवाजाही कर सकें।

हकीकत: कुन्हाड़ी और लैंडमार्क सिटी में हॉस्टल्स के बेतरतीब निर्माण ने ‘हीट कैन्यन’ (गर्मी सोखने वाली कंक्रीट की तंग घाटियाँ) बना दी हैं। ये इमारतें वेंटिलेशन को रोक देती हैं, जिससे स्थानीय तापमान सामान्य से काफी अधिक रहता है। हवा और प्राकृतिक रोशनी की इस कमी से पनपने वाले घुटन भरे वातावरण का सीधा असर छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। कंक्रीट के इन जंगलों में अकेलापन और अवसाद तेजी से पनपता है, जो आज कोटा की सबसे बड़ी चुनौती है।

3. ‘वॉटर स्पंज’ बनाम ‘वॉटर सूप’
विजन: शहर को एक ‘स्पंज सिटी’ बनना था, जो हाइड्रोलॉजिकल मॉडलिंग के ज़रिए बारिश के पानी को वैज्ञानिक तरीके से ज़मीन के अंदर सोख ले।
हकीकत: अत्यधिक कंक्रीटीकरण के कारण ज़मीन की सोखने की क्षमता खत्म हो गई है। लैंडमार्क सिटी जैसे इलाके अब ‘वॉटर सूप’ (सड़कों पर गहरा जलभराव) में बदल गए हैं, जो बुनियादी ढांचे की उम्र कम करने के साथ-साथ छात्रों के लिए अस्वस्थकर स्थितियाँ पैदा करता है।
4. वित्तीय प्रबंधन: वीसीएफ (VCF) की चूक
विजन: वैल्यू कैप्चर फाइनेंसिंग (VCF) के तहत सरकार को बड़े प्रोजेक्ट्स से बढ़ने वाली ज़मीन की कीमतों का एक हिस्सा वसूल कर, वापस उसी इलाके के रखरखाव में लगाना था। इसका प्रबंधन एक सशक्त एसपीवी (SPV) के माध्यम से होना था।

हकीकत: कुन्हाड़ी जैसे इलाकों में संपत्तियों के दाम तो आसमान छू गए, लेकिन एकीकृत प्रशासनिक नेतृत्व के अभाव में सरकार उस बढ़ी हुई कीमत को ‘कैप्चर’ नहीं कर पाई। नतीजतन, आज बुनियादी मरम्मत के लिए भी स्थानीय निकायों के पास फंड की भारी कमी है।
5. पुरानी गलतियों से सबक: रानपुर और ‘अर्बन रीसेट’ का नया अर्थ
कोटा के पास अपनी गलतियों को सुधारने का दूसरा मौका रानपुर के रूप में मौजूद है। इसे एक ‘कोरी पट्टी’ (Blank Slate) की तरह विकसित किया जा रहा है।
यहीं पर ‘अर्बन रीसेट’ का असली आर्थिक और सामाजिक अर्थ सामने आता है।
आने वाले समय में जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) कई पारंपरिक रोजगारों को खत्म कर सकता है, तब हमारे शहरों का ढांचा ऐसा होना चाहिए जो स्थानीय और छोटे व्यवसायों को पनपने का सुरक्षित माहौल दे।
रानपुर में ‘लैंड पूलिंग’ के जरिए विकसित हो रहा ’15-मिनट सिटी’ का मॉडल न केवल हर सुविधा को पैदल दूरी पर लाएगा, बल्कि यह ‘स्मॉल बिजनेस ज़ोन’ के रूप में रोजगार का एक बड़ा केंद्र बन सकता है।

यहाँ कोटा डोरिया और कोटा स्टोन के साथ-साथ, हाड़ौती क्षेत्र की पारंपरिक ‘मंदाना कला’ (Mandana Art) पर आधारित टेक्सटाइल और परिधान उद्योग को विशेष रूप से बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
इस क्षेत्रीय कला को एक व्यवस्थित व्यवसाय का रूप देना न केवल एक एआई-प्रूफ (AI-proof) अर्थव्यवस्था का निर्माण करेगा, बल्कि यह उन समर्पित स्थानीय कलाकारों की विरासत का भी सम्मान होगा जिन्होंने इन सांस्कृतिक धागों को जीवित रखा है।
इसके अलावा लकड़ी के हस्तशिल्प, अगरबत्ती और धातु की कलाकृतियों जैसे अन्य कुटीर उद्योगों को भी यहाँ एक सुरक्षित स्थान मिलना चाहिए। इससे न केवल शहर की पारंपरिक पहचान बचेगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार का एक ऐसा मजबूत विकेंद्रीकृत ढांचा तैयार होगा, जो भविष्य की बेरोजगारी की चुनौती का ठोस समाधान बन सकेगा।
भविष्य की राह: तकनीकी और मानवीय सुधार
वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन: रानपुर जैसे नए क्षेत्रों के लिए ‘वेस्ट-टू-एनर्जी’ (कचरे से बिजली) प्लांट और भूमिगत कचरा पात्र अनिवार्य हों।
क्लाइमेट रेज़िलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर: फ्लाईओवर्स के खंभों पर ‘वर्टिकल ग्रीनरी’ (पौधे) और सड़कों के किनारे ‘सोलर शेड्स’ लगाए जाएं।
प्लानिंग क्षमता: नीति आयोग द्वारा रेखांकित 8,000 शहरी योजनाकारों की कमी को पूरा किया जाए ताकि योजनाएं मुसीबतों से लड़ने में सक्षम (रेज़िलिएंट) बन सकें।

निष्कर्ष: सबके लिए एक स्वस्थ शहर
शहरी कायाकल्प की सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि हम कितनी तेजी से कंक्रीट बिछाते हैं, बल्कि इस पर करती है कि हम कैसा वातावरण बनाते हैं।
कोटा का ‘अर्बन रीसेट’ तब पूरा होगा जब डिजिटल नक्शों और वित्तीय मॉडलों का उपयोग केवल इमारतें खड़ी करने के लिए नहीं, बल्कि हर छात्र को एक तनाव मुक्त ‘काउंसलिंग स्पेस’ और हर स्थानीय नागरिक को एक सुरक्षित, रोजगार-उन्मुख माहौल प्रदान करने के लिए किया जाएगा।