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क राष्ट्र–एक चुनाव : लोकतांत्रिक सुविधा या राजनीतिक वर्चस्व की खोज?

भारत जैसे विशाल, बहुभाषी और विविधतापूर्ण लोकतंत्र में चुनाव केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि जनइच्छा की निरंतर और सजीव अभिव्यक्ति हैं।

लोकतंत्र की जीवंतता इसी में निहित है कि जनता को समयसमय पर अपनी सरकारों के कार्यों का मूल्यांकन करने और अपने प्रतिनिधियों को जवाबदेह ठहराने का अवसर मिलता रहे। ऐसे में ‘एक राष्ट्र–एक चुनाव’ की अवधारणा, जो हाल के वर्षों में पुनः राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आई है,

 

कई बुनियादी और दूरगामी प्रश्न खड़े करती है। क्या यह प्रस्ताव वास्तव में लोकतांत्रिक व्यवस्था को अधिक कुशल बनाने की दिशा में है, या इसके पीछे राजनीतिक वर्चस्व को सुदृढ़ करने की मंशा निहित है?

 

सरकार का तर्क है कि बारबार होने वाले चुनाव विकास की गति को बाधित करते हैं। आदर्श आचार संहिता लागू होते ही नीतिगत निर्णयों पर विराम लग जाता है, प्रशासनिक तंत्र चुनावी दायित्वों में उलझ जाता है और सरकारी संसाधनों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है। निस्संदेह, इन दलीलों में व्यावहारिकता है।
भारत में लगभग हर वर्ष किसी न किसी राज्य में चुनाव होते रहते हैं, जिससे शासन की निरंतरता प्रभावित होती है और विकास योजनाएँ धीमी पड़ जाती हैं। इस दृष्टि से एक साथ चुनाव कराना प्रशासनिक दक्षता और आर्थिक बचत का माध्यम प्रतीत होता है।

 

 

किन्तु इस प्रस्ताव का दूसरा पक्ष कहीं अधिक जटिल और संवेदनशील है।

भारतीय लोकतंत्र की आत्मा उसके संघीय ढांचे में निहित है, जहाँ राज्यों को केवल प्रशासनिक ही नहीं, बल्कि राजनीतिक स्वायत्तता भी प्राप्त है। राज्य विधानसभा चुनाव स्थानीय मुद्दों, क्षेत्रीय आकांक्षाओं और जनता की विशिष्ट समस्याओं को स्वर देने का सशक्त माध्यम होते हैं। यदि सभी चुनाव एक साथ कराए जाते हैं, तो यह आशंका स्वाभाविक है कि राष्ट्रीय मुद्दे, केंद्रीय नेतृत्व और व्यापक राष्ट्रवादी विमर्श चुनावी प्रक्रिया पर हावी हो जाएँगे। परिणामस्वरूप शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, स्थानीय रोज़गार और क्षेत्रीय असंतोष जैसे मुद्दे हाशिए पर धकेले जा सकते हैं।

 

राजनीतिक दृष्टि से भी ‘एक राष्ट्र–एक चुनाव’ कई सवाल खड़े करता है। यह आशंका व्यक्त की जाती है कि एक साथ चुनाव होने की स्थिति में मतदाता का झुकाव प्रायः उसी दल की ओर अधिक होता है, जिसकी राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत उपस्थिति और संसाधनसंपन्न संगठन होता है।

 

इससे बहुदलीय व्यवस्था की विविधता प्रभावित हो सकती है और क्षेत्रीय दलों तथा स्थानीय नेतृत्व की भूमिका कमजोर पड़ने का खतरा बढ़ जाता है। जबकि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति उसकी बहुलता और विभिन्न विचारों व आवाज़ों के सहअस्तित्व में निहित होती है, न कि सत्ता के केंद्रीकरण में।

 

संवैधानिक स्तर पर भी यह प्रस्ताव सरल नहीं है। लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को एकसाथ समाप्त करने या बढ़ाने के लिए व्यापक संविधान संशोधन की आवश्यकता होगी।

इसके लिए न केवल राजनीतिक सहमति, बल्कि गहन संवैधानिक विमर्श और व्यापक राष्ट्रीय संवाद अनिवार्य है। यह प्रश्न केवल चुनावी कैलेंडर का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संतुलन, संघीय संरचना और संविधान की मूल भावना से जुड़ा हुआ है।

 

 

अतः ‘एक राष्ट्र–एक चुनाव’ को न तो पूरी तरह खारिज किया जा सकता है और न ही बिना पर्याप्त विचारविमर्श के स्वीकार किया जा सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि इस प्रस्ताव पर भावनाओं, राजनीतिक लाभ या प्रशासनिक सुविधा के आधार पर नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों, संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक विविधता के संदर्भ में गंभीर, तर्कसंगत और पारदर्शी बहस हो।

 

आख़िरकार, लोकतंत्र की असली मजबूती सुविधा या त्वरित निर्णयों में नहीं, बल्कि जनसहभागिता, राजनीतिक बहुलता और संस्थागत संतुलन में निहित होती है। कोई भी चुनावी सुधार तभी सार्थक और स्वीकार्य होगा, जब वह सत्ता की सुविधा नहीं, बल्कि जनता की आवाज़ को और अधिक सशक्त बनाए।

-अमिता शर्मा

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