योजनाओं का देश: काग़ज़ों का सच और ज़मीनी हकीकत
भारत सरकार समय-समय पर अनेक कल्याणकारी योजनाएँ लागू करती रही है, ताकि देश के गरीब और वंचित वर्गों को बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा सकें और उनके जीवन-यापन में सहायता मिल सके। काग़ज़ों में ये योजनाएँ उम्मीद बनकर उतरती हैं, लेकिन ज़मीन पर पहुँचते-पहुँचते बिचौलियों, भ्रष्टाचार, दलाली और प्रशासनिक जटिलताओं की भेंट चढ़ जाती हैं। परिणाम यह होता है कि जिनके नाम पर योजनाएँ बनाई जाती हैं, वही उनसे सबसे दूर खड़े नज़र आते हैं। सवाल योजनाओं के इरादों का नहीं, बल्कि उनकी जमीनी हकीकत का है—इसी की पड़ताल यह लेख करता है।
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना वर्ष 2016 में लगभग 8,000 करोड़ रुपये की लागत से “स्वच्छ ईंधन, बेहतर जीवन” के नारे के साथ शुरू की गई। उद्देश्य था गरीब परिवारों की महिलाओं को स्वच्छ रसोई ईंधन उपलब्ध कराना। सरकारी आँकड़ों में एल पी जी कनेक्शनों की संख्या को योजना की सफलता के रूप में प्रस्तुत किया गया, लेकिन निरंतर उपयोग की शर्तें पीछे छूट गईं। गुजरात के पंचमहल ज़िले के मोघर–मोखा गाँव की शारदाबेन और साबरकांठा ज़िले की बड़ाली तालुका के रामपुरा गाँव की लीलाबेन जैसे लाभार्थियों के अनुभव बताते हैं कि केवल कनेक्शन मिल जाना पर्याप्त नहीं है।
रिफ़िल की ऊँची कीमतें, अनियमित आय और व्यवहारगत कारण गैस के नियमित उपयोग में बड़ी बाधाएँ हैं। आँकड़े बताते हैं कि लगभग 90 लाख लाभार्थियों ने ऊँची कीमतों के कारण एल पी जी रिफ़िल खरीदने से इनकार किया, जबकि 1 करोड़ 18 लाख से अधिक लोगों ने एक बार भी रिफ़िल नहीं खरीदा। सिलेंडर की कीमत 300 रुपये से बढ़ाकर 450 रुपये कर देना गरीब परिवारों के लिए वहन योग्य नहीं रहा, नतीजतन कई परिवार फिर से पारंपरिक ईंधनों की ओर लौट गए। एनर्जी पॉलिसी और वर्ल्ड डेवलपमेंट जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित अध्ययनों में भी यह पाया गया है कि एल पी जी अपनाने की दर बढ़ने के बावजूद अधिकांश परिवार पारंपरिक ईंधनों का उपयोग पूरी तरह बंद नहीं कर पाए हैं।
प्रधानमंत्री आवास योजना
प्रधानमंत्री आवास योजना की शुरुआत वर्ष 2015 में “सबके लिए आवास” के लक्ष्य के साथ की गई थी। योजना के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग, निम्न आय वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य वंचित समुदायों को सुरक्षित और सम्मानजनक आवास उपलब्ध कराने का दावा किया गया। नीति आयोग और भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सी ए जी) की रिपोर्टों में योजना की प्रगति, धनराशि के उपयोग और लक्ष्य-पूर्ति का विश्लेषण किया गया है, लेकिन इन रिपोर्टों में गंभीर अनियमितताओं की ओर भी संकेत मिलता है।
मैनपुर ज़िले का उदाहरण सामने आता है, जहाँ 3,500 मकानों का गृह प्रवेश दर्ज कर दिया गया, जबकि लगभग 1,000 मकानों की छत तक नहीं बनी थी। ऐसे मामलों ने गुणवत्ता नियंत्रण में कमी और लाभार्थी चयन में अनियमितताओं को उजागर किया। स्वतंत्र शोध संस्थानों और गैर-सरकारी संगठनों के अध्ययनों में आदिवासी क्षेत्रों, वन अधिकार क्षेत्रों और शहरी झुग्गी बस्तियों में योजना की सीमाएँ सामने आई हैं। अनूपपुर ज़िले की नगर परिषद राजनगर में बेगा जनजाति के लोगों को, जो पीढ़ियों से जिस भूमि पर रह रहे थे, उसे वन अधिकार क्षेत्र बताकर खाली करने के निर्देश दिए गए, जबकि पूर्व में उन्हीं लोगों को पट्टे जारी किए जा चुके थे।
आयुष्मान भारत–प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना
आयुष्मान भारत–प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना की शुरुआत वर्ष 2018 में देश की गरीब और कमजोर आबादी को स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी। इसके अंतर्गत प्रति परिवार प्रति वर्ष पाँच लाख रुपये तक के निःशुल्क इलाज का प्रावधान किया गया। भारत में बीमारी लंबे समय से गरीबी का एक प्रमुख कारण रही है। दवाइयों, जाँचों और अस्पताल के खर्चों के कारण लाखों परिवार हर वर्ष कर्ज़ में डूब जाते हैं।
इस पृष्ठभूमि में योजना को सराहनीय पहल माना गया, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसके क्रियान्वयन में गंभीर समस्याएँ सामने आईं। ऑक्सफैम इंडिया, पब्लिक हेल्थ फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडिया और सेंटर फ़ॉर पॉलिसी रिसर्च जैसे संस्थानों के अध्ययनों में निजी अस्पतालों की भागीदारी, भुगतान में देरी और इलाज की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं। फरवरी 2024 तक निजी अस्पतालों के लगभग 1 लाख 21 हज़ार करोड़ रुपये के बिल लंबित बताए गए, जिसके कारण कई राज्यों में निजी अस्पतालों ने योजना के तहत इलाज बंद कर दिया। “कैशलेस इलाज” के दावे के बावजूद मरीजों से अतिरिक्त खर्च वसूले जाने की शिकायतें भी सामने आईं।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम को वर्ष 2013 में लागू किया गया, जिसके तहत गरीब और कमजोर वर्गों को प्रति व्यक्ति प्रति माह पाँच किलोग्राम अनाज 2 से 3 रुपये प्रति किलोग्राम की रियायती दर पर उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया। भोजन को कल्याणकारी सहायता से आगे बढ़ाकर एक कानूनी अधिकार के रूप में स्थापित करना इसका मूल उद्देश्य था। लेकिन जमीनी स्तर पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के भीतर विश्वसनीय डेटा, डिजिटल ट्रैकिंग और मज़बूत निगरानी तंत्र के अभाव में बहिष्करण और अनियमितताएँ बनी रहीं।
पारदर्शिता के अभाव को लेकर एक याचिका भी दायर की गई, जिसमें तर्क दिया गया कि खाद्य सुरक्षा संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है। 2011 के बाद जनगणना न होने के कारण करोड़ों लोग इस अधिनियम के दायरे से बाहर रह गए। 26 जनवरी 2025 को नए नाम जोड़े गए, लेकिन ई-केवाईसी जैसी शर्तों को पूरा करने के बाद भी कई पात्र लोग आज भी लाभ से वंचित है।
भूख, खाद्य असुरक्षा और किसी भी प्रकार के कुपोषण का उन्मूलन वर्ष 2030 तक प्राप्त किए जाने वाले सतत विकास लक्ष्यों में एक प्रमुख लक्ष्य है। किंतु बढ़ते वैश्विक और क्षेत्रीय संघर्ष, जलवायु परिवर्तन के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता, चरम मौसमी घटनाएँ तथा संवेदनशील और खाद्य-कमी से जूझ रहे क्षेत्रों में आर्थिक मंदी—इन सभी कारकों को देखते हुए यह लक्ष्य अभी भी दूर की चुनौती बना हुआ है।
निष्कर्ष
उज्ज्वला, आवास, आयुष्मान भारत और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा—इन सभी योजनाओं का समग्र अनुभव यह दर्शाता है कि नीतिगत घोषणाएँ और सरकारी आँकड़े ज़मीनी सच्चाई को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करते। जब तक वहन-क्षमता, पारदर्शिता, दस्तावेज़ी बाधाओं और प्रशासनिक जवाबदेही को सुदृढ़ नहीं किया जाता, तब तक कल्याणकारी योजनाएँ काग़ज़ों में सफल और ज़मीन पर अधूरी ही बनी रहेंगी।
अधिक जानकारी के लिए देखें: राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम की आधिकारिक वेबसाइट
अमीता शर्मा