Final Chapter -IV The Tale of AIR 143

Some Stories never end …

But always a new chapter begins .. so is the same …

The Struggling tale of AIR -143’s mom 

मुंबई का एक बच्चा। नाम—साहिल प्रधान।

28 नवंबर को उसका जन्मदिन आता है। उस साल जब उसने अपना दसवाँ जन्मदिन मनाया होगा, केक काटा होगा, दोस्तों के साथ हँसा होगा, तब क्या उसे अंदाज़ा रहा होगा कि उसके सिर पर पिता का साया अब केवल कुछ ही दिनों का मेहमान है?

उसी वर्ष 23 दिसंबर को उसके पिता का निधन हो गया।

दस साल का एक बच्चा। एक माँ। और अचानक बदलती हुई दुनिया।

हम अक्सर सफलता की कहानियाँ पढ़ते हैं, लेकिन उन कहानियों के पीछे छिपे हुए संघर्षों को नहीं देख पाते। कोई नहीं जानता कि उस माँ ने कितनी रातें चिंता में बिताई होंगी। आर्थिक चुनौतियों के बीच अपने बेटे का भविष्य सँवारने के लिए उन्होंने कितने त्याग किए होंगे। और वह बच्चा, जिसे उस उम्र में खिलौनों और खेलों की दुनिया में होना चाहिए था, उसने शायद समय से पहले ही ज़िंदगी की कठिन किताब पढ़नी शुरू कर दी।

मगर कुछ कहानियाँ हार मानने के लिए नहीं लिखी जातीं।

साहिल की कहानी भी ऐसी ही एक कहानी है। यह कहानी बताती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठोर क्यों न हों, अगर संकल्प अडिग हो, तो रास्ते निकल आते हैं। यह कहानी त्याग की है, संघर्ष की है, और उस तपस्या की है जो धीरे-धीरे एक साधारण बच्चे को असाधारण उपलब्धियों तक पहुँचा देती है।

आज जब साहिल ने एक बड़ा मुकाम हासिल किया है, तो उसकी सफलता केवल उसकी नहीं है। उसमें एक माँ के अनगिनत त्याग शामिल हैं, एक बच्चे का मौन संघर्ष शामिल है, और उन सपनों की चमक शामिल है जिन्हें कठिनाइयाँ भी बुझा नहीं सकीं।

क्योंकि अंत में जीत प्रतिभा की ही नहीं होती, जीत उस तपस्या की भी होती है जो वर्षों तक बिना शोर किए चलती रहती है। और साहिल प्रधान की कहानी इसी जीत का प्रमाण है।

एक मां की तपस्या, एक बेटे का सपना और सफलता की उड़ान

हाल ही में मेरी साहिल की मां से लंबी बातचीत हुई। सच कहूं तो वह केवल एक इंटरव्यू नहीं था। वह संघर्ष, साहस, मातृत्व और जीवन की कठोर सच्चाइयों से भरा एक ऐसा संवाद था, जिसने मुझे भीतर तक झकझोर दिया।

बातचीत के दौरान कई बार उनकी आवाज भर्रा गई। कई बार वे भावुक हुईं। और सच कहूं तो कई बार मुझे भी अपने आंसुओं को रोकना पड़ा। उस बातचीत का असर इतना गहरा था कि देर रात तक मैं सामान्य नहीं हो पाई। उन्होंने समाज, रिश्तेदारों और जीवन के संघर्षों की जो सच्चाइयां साझा कीं, उन्होंने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या सचमुच हमारा समाज इतना संवेदनहीन हो गया है कि किसी के संघर्ष को समझने के बजाय उसका आकलन करने लगता है?

उन्होंने बताया कि साहिल की पढ़ाई के लिए उन्होंने किस तरह अपना जीवन समर्पित कर दिया। दसवीं कक्षा तक उन्होंने उसे किसी ट्यूशन पर निर्भर नहीं होने दिया। हर सुबह वह उसके लिए टेस्ट पेपर तैयार करके रखती थीं। घर के कामकाज के बीच भी उनका ध्यान लगातार इस बात पर रहता था कि बेटे की पढ़ाई में कोई कमी न रह जाए।

जब मैंने उनसे पूछा कि पति के निधन के बाद उन्होंने स्वयं को कैसे संभाला, तो उनका उत्तर सुनकर मेरी आंखें नम हो गईं।

उन्होंने कहा, “शुरुआत में जब मैं रोती थी तो मेरा बेटा भी मेरे साथ रोता था। तब मैंने तय किया कि अब इसके सामने नहीं रोऊंगी। मैं अपने आंसुओं को जैसे मुट्ठी में बंद करके रखती थी। जब यह स्कूल चला जाता था, तब मैं रो लेती थी। हर छोटी-बड़ी बात पर इसके पिता की याद आती थी, लेकिन मैंने अपने दुख को अपने बच्चे की कमजोरी नहीं बनने दिया।”

यह सुनते हुए मुझे अपने जीवन की एक पुरानी घटना याद आ गई।

अक्सर मैं अपनी बेटी के लिए किए गए त्याग और संघर्षों का उल्लेख किया करती थी। तब मेरे बड़े भाई समान मेरे मामा के बेटे नितिन उपाध्याय, जो वर्तमान में इसरो में कार्यरत हैं, ने मुझे डांटते हुए एक ऐसी बात कही थी, जिसने मातृत्व को देखने का मेरा पूरा दृष्टिकोण बदल दिया।

 

 

उन्होंने कहा था, “क्या तुमने कभी किसी बीज को अंकुरित होते देखा है? जब एक बीज वृक्ष बनने की यात्रा शुरू करता है, तब वह अपना अस्तित्व मिटा देता है। वह मिट्टी में दब जाता है, स्वयं को गलाता है, तब कहीं जाकर एक पौधा जन्म लेता है। मां भी उसी बीज की तरह होती है। वह अपने सपनों, अपनी इच्छाओं, अपने आराम और कभी-कभी अपने दुखों तक को मिट्टी में दबा देती है, ताकि उसका बच्चा एक दिन एक विशाल वृक्ष बन सके।”

उस समय मैंने उनकी बात सुनी जरूर थी, लेकिन शायद उसकी गहराई को पूरी तरह समझ नहीं पाई थी।

 

 

कल जब मैं साहिल की मां से बात कर रही थी, तब मुझे लगा कि यह उदाहरण साक्षात मेरे सामने खड़ा है। उन्होंने अपने दुखों को छिपाया, अपने आंसुओं को रोक लिया, अपनी इच्छाओं को पीछे रख दिया और अपने बेटे के भविष्य को अपना एकमात्र लक्ष्य बना लिया।

 

 

साहिल की मां उस बीज की तरह हैं जिसने स्वयं को मिट्टी में समर्पित कर दिया, ताकि उनका बेटा एक दिन सफलता के आकाश में ऊंची उड़ान भर सके। शायद इसी कारण उन्होंने कभी अपने त्याग का बखान नहीं किया। उन्होंने केवल अपना कर्तव्य निभाया और आज उसी कर्तव्य की तपस्या एक उपलब्धि बनकर सामने खड़ी है।

बातचीत के अंत में मैंने उनसे अन्य अभिभावकों के लिए संदेश मांगा। उनका उत्तर जितना सरल था, उतना ही गहरा भी।

उन्होंने कहा, “सबसे बड़ी गलती तब होती है जब माता-पिता समाज को दिखाने के लिए बच्चों पर अपने सपने थोप देते हैं। सिर्फ इसलिए कि दूसरे बच्चे इंजीनियरिंग या मेडिकल की तैयारी कर रहे हैं, अपने बच्चे को भी उसी दिशा में धकेल देना सही नहीं है। हर बच्चा अपनी अलग क्षमता लेकर जन्म लेता है। माता-पिता और शिक्षकों का काम उस क्षमता को पहचानना और उसे निखारना है, न कि अपनी अधूरी महत्वाकांक्षाएं बच्चों पर थोपना।”

उनकी यह बात केवल एक संदेश नहीं, बल्कि आज के समय के लिए एक महत्वपूर्ण सीख है।

आज जब साहिल देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक में शानदार प्रदर्शन करने जा रहा है, तब उसकी सफलता के पीछे खड़ी उस मां को नमन करने का मन करता है, जिसने परिस्थितियों को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी शक्ति बना लिया।

यह सफलता केवल साहिल की नहीं है। यह उसकी मां की अनगिनत जागी हुई रातों, मौन संघर्षों, रोके गए आंसुओं, अधूरी इच्छाओं और अटूट विश्वास की सफलता है।

मैं साहिल को उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामनाएं देती हूं। साथ ही उसकी मां को शत-शत नमन करती हूं, जिन्होंने मुझे भी एक बेहतर मां बनने की सीख दी। सच कहूं तो कल मैं उनका इंटरव्यू लेने बैठी थी, लेकिन उठी मैं उनकी शिष्या बनकर। उन्होंने मेरा एक भ्रम तोड़ा, मेरा एक अहंकार तोड़ा और मुझे यह सिखाया कि मातृत्व का वास्तविक अर्थ त्याग का प्रदर्शन नहीं, बल्कि त्याग का मौन निर्वाह है।

सचमुच, कुछ माताएं अपने बच्चों को केवल जन्म नहीं देतीं, वे अपने जीवन को तपस्या बनाकर उनके सपनों को जन्म देती हैं।

साहिल की मां ऐसी ही एक तपस्विनी मां हैं। उन्हें मेरा सादर प्रणाम, शत-शत नमन

और दिल से सलाम।

Sahil Pardhan’s interview 

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