क्या यही हैं राधाकृष्णन के बच्चे?
किसी बच्चे से पूछिए—
“तुम्हारा स्कूल कहाँ है?”
वह शायद किसी बड़ी-सी इमारत की तरफ़ उंगली न उठाए।
वह बस एक पेड़ दिखाकर कह दे—
“वहीं पढ़ते हैं।”
किसी बच्चे के हाथ में
फटी हुई कॉपी होगी,
कंधे पर पुराना-सा बस्ता,
पैरों में शायद चप्पल भी नहीं,
कपड़े धूल से मैले होंगे।
लेकिन उन आँखों में देखिएगा—
वहाँ एक चमक होगी।
कुछ बनने की चमक।
कुछ कर दिखाने का उत्साह।
वह धूप में भी आएगा,
बारिश में भी आएगा।
क्योंकि उसे लगता है—
स्कूल जाएगा तो जिंदगी बदल जाएगी।
और फिर सोचिए…
किसी सुबह वह बच्चा
अपनी फटी हुई कॉपी सीने से लगाए,
नंगे पाँव या घिसी हुई चप्पलों में
स्कूल पहुँचता है—
और सामने मिलता है…
एक बंद दरवाज़ा।
उस पर लटका हुआ ताला।
उस पल उसके छोटे-से मन में
क्या गुजरती होगी?
हम कल्पना भी नहीं कर सकते।
जिस बच्चे ने गरीबी से लड़कर
स्कूल तक आने की हिम्मत जुटाई,
जिसकी आँखों में पढ़कर कुछ बनने का सपना है,
उसे जब शिक्षा की जगह
व्यवस्था की बेरुखी मिलती है,
तो उसके मन में क्या टूटता होगा?
हमने उन्हें
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की कहानी सुनाई।
हमने उन्हें
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के सपने सुनाए।
कहा—
“पढ़ो, सपने देखो, बड़ा बनो।”
बच्चों ने हमारी बात मान ली।
उन्होंने सपने देख लिए।
अब सवाल हमसे है—
क्या हमने उनके सपनों के लिए
एक छत भी तैयार की?
क्योंकि स्कूल तो है।
लेकिन कहाँ है?
किस हालत में है?
और उसमें पढ़ने वाला बच्चा
किस हालत में है?
इन सवालों से
न सरकार को कोई फर्क पड़ता है,
न प्रशासन को,
न स्कूल प्रशासन को,
और न ही शिक्षा मंत्री को।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का विश्वास था कि
शिक्षा केवल जानकारी नहीं,
बल्कि मनुष्य और समाज को बेहतर बनाने का माध्यम है।
और डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का विश्वास था कि
सपने ही विचार बनते हैं और विचार ही कर्म में बदलकर भविष्य का निर्माण करते हैं।
तो ज़रा इन बच्चों की आँखों में देखिए…
इनकी आँखों में भी सपने हैं।
बहुत छोटे-छोटे सपने।
किसी को डॉक्टर बनना है,
किसी को शिक्षक,
किसी को इंजीनियर।
उन्हें किसी एहसान की जरूरत नहीं।
बस एक ऐसी कक्षा चाहिए
जहाँ वे सम्मान से बैठ सकें,
सीख सकें,
और अपने सपनों को
सच करने की शुरुआत कर सकें।
क्योंकि किसी बच्चे का सपना
उसकी गरीबी से छोटा नहीं होना चाहिए