
काश, आज आप होते…
आज आपका जन्मदिन है।
लोग अक्सर अपने प्रियजनों के जन्मदिन या पुण्यतिथि पर,
जो अब इस दुनिया में नहीं हैं,
उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा करते हैं।
दुख और शोक व्यक्त करने का हर व्यक्ति का अपना-अपना तरीका होता है।
मैं पहली बार यह हिम्मत जुटा पा रही हूँ।
आपको गए हुए सत्रह वर्ष हो चुके हैं।
शायद यह साहस भी मुझे इसलिए मिल पाया है
क्योंकि अब मैं लेखन से जुड़ी हूँ।
इन सत्रह जन्मदिनों को मैंने आपके बिना बिताया है।
आपके जाने का दर्द अब इतना गहरा हो चुका है
कि वह भीतर समा नहीं पाता।
और आज, आपके इस जन्मदिन पर,
माँ सरस्वती की कृपा से
मुझे अपने दर्द को शब्दों में ढालने की शक्ति मिली है।
मैं यह नहीं कहती कि इन शब्दों से
मैं इस पीड़ा से मुक्त हो जाऊँगी,
लेकिन शायद इतना अवश्य होगा
कि मैं अपने भीतर दबे इस दर्द को
कुछ हद तक बाहर निकाल पाऊँगी।
मेरी कविता का शीर्षक है —
“पापा, काश आज आप होते…”
यह “काश” शायद किसी एक पन्ने में समाने वाला नहीं है।
यह उन अनगिनत तारों भरे आसमान जितना विशाल है,
पर उस अथाह “काश” में से
कुछ भाव मैं शब्दों में व्यक्त करना चाहती हूँ।
पापा, काश आज आप होते
तो मेरा बचपन समय से पहले न छिना होता।
पापा, काश आज आप होते
तो मैं भी स्वच्छंद आकाश में
चिड़िया की तरह उड़ रही होती।
पापा, काश आप आज यहाँ होते
तो मुझे इस समाज की
बेवजह इतनी गुलामी न करनी पड़ती।
पापा, काश आप आज यहाँ होते
तो मुझे हर रिश्ते में,
एक भिखारी की निगाहों की तरह,
अपने पिता का स्नेह न ढूँढ़ना पड़ता।
पापा, काश आप आज यहाँ होते
तो शायद मुझे अपनी ज़िदों को
किसी पोटली में बाँधकर
किसी कोने में न रखना पड़ता।
पापा, काश आज आप होते
तो शायद मेरी बेटी को
मुझसे भी अधिक चाहने वाला
इस दुनिया में कोई होता।
पापा, काश आप आज यहाँ होते
तो मैं हर गर्मियों में
आज भी आपके पैरों में मेहंदी लगाती,
आपके तलवों को अपने हाथों से रंगती।
पापा, काश आप आज यहाँ होते
तो आपके सिर में चार सफेद बाल दिखते ही
मैं हँसते हुए उन पर डाई कर रही होती।
पापा, काश आप आज यहाँ होते
तो मैं छोटी-छोटी, बेमतलब बातों पर
हंगामे करती रहती।
वह चुलबुलापन, वह अल्हड़पन
मुझसे इतनी जल्दी दूर न हुआ होता।
पर समय ने मुझे
उम्र से पहले बड़ा कर दिया।
ज़िम्मेदारियों ने
मेरे हिस्से की मासूमियत चुरा ली।
और दुनिया ने यह सिखा दिया
कि जिनके सिर पर पिता का हाथ नहीं होता,
उन्हें अक्सर अपने आँसू भी
खुद ही पोंछने पड़ते हैं।
फिर भी…
आप कहीं न कहीं मेरे भीतर जीवित हैं।
मेरी हर दुआ में,
मेरी हर कविता में,
मेरी हर अधूरी मुस्कान में।
और शायद इसी लिए
आज भी मैं आसमान की ओर देखकर
धीरे से कह देती हूँ —
काश…
आज आप यहाँ होते।
✍️ लेखिका: अमिता कोठारी