
पिता: एक दिन नहीं, एक सम्पूर्ण संसार
अमिता शर्मा
पिता… यह मात्र एक शब्द नहीं, एक सम्पूर्ण संसार है। और किसी सम्पूर्ण संसार को शब्दों की स्याही से कागज़ पर उकेरना केवल कठिन ही नहीं, लगभग असंभव है। ज़रा सोचिए, जिसने अपने त्याग, समर्पण और संघर्ष को स्याही बनाकर हमारी जीवन-कथा लिखी हो, उसके योगदान को शब्दों में कैसे समेटा जा सकता है? कितने ही भारी-भरकम विशेषण क्यों न जोड़ दिए जाएँ, वे उनके बलिदान के सामने हमेशा छोटे ही पड़ेंगे।
आज औपचारिकताओं का युग है। लगभग हर भावना, हर रिश्ते और हर अवसर का किसी न किसी रूप में व्यावसायीकरण हो चुका है। अन्यथा अपने ही रचयिता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए किसी विशेष दिन की आवश्यकता क्यों पड़ती? जिनके प्रति आभार व्यक्त करने के लिए पूरा जीवन भी कम पड़ जाए, उन्हें एक दिन में समेट देना कहीं न कहीं हास्यास्पद प्रतीत होता है।

फिर भी समाज का हिस्सा हैं, तो उसकी बदलती प्रवृत्तियों का थोड़ा आनंद भी ले लेते हैं। कुछ विशेष दिवसों की परंपरा शायद बाज़ार की चतुर कल्पना का परिणाम रही हो। वैलेंटाइन डे से आरम्भ हुई यह यात्रा अब ऐसे मुकाम पर पहुँच गई है जहाँ वर्ष के लगभग हर दिन को किसी न किसी उत्सव का नाम देने की तैयारी दिखाई देती है।
मज़े की बात यह है कि मदर्स डे और फादर्स डे जैसे दिवस भी रविवार को ही मनाने का प्रावधान रखा गया है। कारण समझना कठिन नहीं है—भावनाएँ भी सुविधानुसार और बाज़ार भी लाभानुसार चल सके। सभी प्रसन्न रहें और व्यापार भी फलता-फूलता रहे।
हम उस पीढ़ी से आते हैं जहाँ संस्कार हमारे भीतर कूट-कूटकर भरे जाते थे। “कूट-कूटकर” शब्द का अर्थ आप अपने अनुभव के अनुसार निकाल सकते हैं। परिणाम यह था कि माता-पिता के प्रति सम्मान किसी कैलेंडर की तारीख़ का मोहताज नहीं था। आज भी यदि हम इन दिनों को किसी विशेष ढंग से मनाते हैं तो केवल इसलिए कि दिल के किसी कोने में हमारे लिए हर दिन ही मदर्स डे और फादर्स डे होता है।
लेकिन आने वाली पीढ़ियाँ, विशेषकर जेन-अल्फा, एक बिल्कुल अलग सामाजिक परिवेश में बड़ी हो रही हैं। उनके लिए यह समझना कठिन होता जा रहा है कि माता-पिता के साथ बिताया गया समय किसी विशेष अवसर का नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक हिस्सा होना चाहिए। उन्हें यह बताना पड़ता है कि प्रेम और सम्मान केवल सोशल मीडिया पोस्ट, उपहारों और एक-दिवसीय उत्सवों तक सीमित नहीं होते।

कभी-कभी मन प्रश्न करता है कि हमारी जड़ें तो इतनी मजबूत थीं, फिर फलों में यह कमजोरी कहाँ से आ गई? शायद उत्तर हमारे समय के वातावरण में छिपा है। दिखावे के प्रदूषण ने संवेदनाओं की मिट्टी को प्रभावित किया है। परिणामस्वरूप रिश्तों की स्वाभाविक सुगंध पर कृत्रिम चमक की परतें चढ़ती जा रही हैं। जो भावनाएँ कभी जीवन का स्वभाव थीं, वे अब प्रदर्शन का विषय बनती जा रही हैं।
फिर भी आशा शेष है। क्योंकि माता-पिता के प्रति प्रेम किसी दिवस का नहीं, संस्कार का विषय है। और संस्कार, यदि सच्चे हों, तो बाज़ार की सबसे आकर्षक सजावट भी उन्हें कभी प्रतिस्थापित नहीं कर सकती।

इसलिए यदि फादर्स डे मनाइए तो अवश्य मनाइए, पर इतना याद रखिए कि पिता का महत्व कैलेंडर के एक दिन में नहीं, जीवन के हर दिन में बसता है। क्योंकि पिता कोई अवसर नहीं, एक ऐसी उपस्थिति हैं जिनकी छाया में पूरा जीवन आकार पाता है।