The Guest
Dr. Akhil Agrawal
Consultant Psycho-sexologist
Director of Manash Hospital
विशेष साक्षात्कार: टूटते पारिवारिक ढांचे, बदलती जीवनशैली और हमारा डिप्रेशन में जाता यूथ
प्रस्तावना:
बदलते दौर में हमारी युवा पीढ़ी केवल करियर की दौड़ में ही नहीं, बल्कि एक गहरे मानसिक और भावनात्मक संकट से भी गुज़र रही है। घटते पारिवारिक संबंध, सोशल मीडिया का अति-प्रभाव, और नशे के बदलते खतरनाक रूप मिलकर युवाओं को अवसाद (Depression) और आत्महत्या की ओर धकेल रहे हैं। इस गंभीर विषय पर स्वतंत्र स्तंभकार और पत्रकार अमिता शर्मा की डॉक्टर अखिल अग्रवाल (वरिष्ठ काउंसलर) के साथ हुई बातचीत का यह विशेष साक्षात्कार
प्रारूप:
भाग 1: 20 वर्ष पहले बनाम आज का युवा: एंजायटी और पैरेंटिंग का बदलता फेज़
अमिता शर्मा (पत्रकार): सर, जैसे आप इतने लंबे समय से इस प्रोफेशन से जुड़े हुए हैं और बच्चों को मानसिक तनाव (Stress) से बाहर निकालने के लिए कई सेमिनार कर चुके हैं। आप पहले के मामलों और आज के मामलों में क्या अंतर महसूस करते हैं? आज मैं देख रही हूँ कि बच्चों में इमोशंस कम हो रहे हैं। संयुक्त परिवार बहुत तेज़ी से एकल परिवारों (Nuclear Families) में बदल रहे हैं, जिससे बच्चों में डिप्रेशन बढ़ रहा है। आज किस तरह के मामले ज़्यादा आते हैं?
डॉक्टर अखिल अग्रवाल: देखिए, अगर हम व्यापक रूप से टीनएजर्स की बात करें, तो पहले का दौर अलग था। तब बच्चे मानसिक रूप से थोड़े ज़्यादा परिपक्व (Mature) होते थे। आज स्थिति यह है कि बच्चों का स्ट्रेस (Level) बहुत ही कम उम्र (जैसे 9वीं क्लास या उससे भी पहले) से शुरू हो जाता है। वे इतने परिपक्व नहीं हो पाते कि चीज़ों को स्पष्ट रूप से समझ सकें, परिभाषित कर सकें या किसी से खुलकर डिस्कस कर सकें।
अमिता शर्मा (पत्रकार): जी, यह बिल्कुल सही बात है।
डॉक्टर अखिल अग्रवाल: इसके साथ ही, एक बड़ा बदलाव माता-पिता में आया है। आज के माता-पिता खुद बहुत महत्वाकांक्षी हैं। असल में, आजकल बच्चों की तुलना में माता-पिता की एंजायटी (Anxiety) बहुत ज़्यादा है। माता-पिता जाने-अनजाने अपनी इस एंजायटी को बच्चों पर ट्रांसफर करते हैं। वे बच्चों के मन में यह डर बैठा देते हैं कि “अगर आप बहुत टॉप प्रोफेशन में नहीं हो, अगर परफॉर्म नहीं कर पाओगे, तो लाइफ में आपका क्या मोटो रह जाएगा।“ यह दबाव बच्चों को अंदर से तोड़ देता है।
भाग 2: सोशल मीडिया, पीयर प्रेशर और नशे (Addiction) का बदलता भयानक रूप
अमिता शर्मा (पत्रकार): जी सर, यह बहुत बड़ी समस्या है कि पैरेंट्स की खुद की नेगेटिविटी और महत्वाकांक्षा बच्चों पर हावी हो रही है। इसके अलावा आज के दौर के अन्य क्या कारण हैं?
डॉक्टर अखिल अग्रवाल: दूसरा बड़ा कारण है सोशल मीडिया। आज कोई भी बच्चा सोशल मीडिया से अछूता नहीं है। पहले के समय में बच्चों पर इस तरह का ‘पीयर प्रेशर’ (Peer Pressure) और दिखावे का दबाव नहीं था, जो आज बहुत ज़्यादा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि आज एडिक्शन (Addiction) अपने
पीक पर है और हर तरह का नशा बहुत कॉमन हो चुका है।
अमिता शर्मा (पत्रकार): हाँ सर, आज की युवा पीढ़ी में नशे का पूरा ट्रेंड ही बदल गया है।
डॉक्टर अखिल अग्रवाल: बिल्कुल। आज से 5 साल पहले तक समाज में अल्कोहल (शराब) का चलन बढ़ रहा था, लेकिन आज का यूथ अल्कोहल को बहुत छोटी चीज़ मानता है। अब युवा पीढ़ी ‘सूखे नशों’ की तरफ बढ़ रही है—जैसे गांजा, वीड, एलएसडी (LSD), एमडी (MD) और कोकीन। यह सूखे नशे बहुत ज़्यादा कॉमन हो चुके हैं, जो बच्चों के मानसिक संतुलन और उनके थॉट प्रोसेस को पूरी तरह नष्ट कर देते हैं। ये सारे फैक्टर्स बच्चों की एंजायटी को तेज़ी से बढ़ाते हैं।
भाग 3: सुसाइड (आत्महत्या) के वास्तविक कारण: जो समाज से छुपाए जाते हैं
अमिता शर्मा (पत्रकार): सर, मेरे प्रशासनिक अधिकारियों और जांचकर्ताओं से भी इस विषय पर बात हुई है। उनका भी यह कहना है कि जब कोई बच्चा सुसाइड जैसा कदम उठाता है, तो गहराई से जांच करने पर पता चलता है कि हर मामले के पीछे केवल करियर या पढ़ाई का दबाव नहीं होता। इसके पीछे कई अन्य व्यक्तिगत और सामाजिक कारण होते हैं, जिनपर समाज बात नहीं करना चाहता।
डॉक्टर अखिल अग्रवाल: आप बिल्कुल सही कह रही हैं। अगर हम पूरे देश में युवाओं के सुसाइड के मामलों का विश्लेषण करें और वास्तविक कारण (Reasons) निकालें, तो उसमें सबसे पहला और मोस्ट इंपॉर्टेंट रीज़न ‘लव अफेयर्स’ और ‘वन-साइडेड ऑब्सेशन’ (एकतरफा जुनून) के रूप में सामने आता है। टीनएजर्स में होने वाले हार्मोनल बदलावों के कारण वे बहुत जल्दी आकर्षित होते हैं, और जब उस रिश्ते में कोई समस्या आती है, तो वे उस रिजेक्शन को बर्दाश्त नहीं कर पाते।
अमिता शर्मा (पत्रकार): जी, इस उम्र में बच्चे इतने परिपक्व नहीं होते कि वे ब्रेकअप या रिजेक्शन के तनाव को संभाल सकें।
डॉक्टर अखिल अग्रवाल: हाँ, इसके बाद एडिक्शंस (नशा), फैमिली कॉन्फ्लिक्ट्स (पारिवारिक झगड़े) और घरेलू हिंसा या एब्यूज़ जैसे कारण आते हैं। इस उम्र (13 से 17 साल) में बच्चों का मैच्योरिटी लेवल इतना नहीं होता कि वे इन जटिल पारिवारिक और व्यक्तिगत परिस्थितियों को समझ सकें, बॉन्डिंग को संभाल सकें या सामने वाले के गुस्से का सामना कर सकें।
भाग 4: एकल परिवार (Nuclear Family) और टूटता इमोशनल सपोर्ट सिस्टम
अमिता शर्मा (पत्रकार): सर, एक बात जो मेरे दिमाग में आती है कि पहले परिवारों में एक बड़ा भावनात्मक सपोर्ट सिस्टम होता था। अगर बच्चा माता-पिता से परेशान भी होता था, तो घर में दादा-दादी, चाचा-चाची या बुआ होते थे जिनसे बच्चा अपनी बात कह लेता था और वह इमोशनली सुरक्षित (Secure) रहता था। आज एकल परिवार हैं, माता-पिता दोनों वर्किंग हैं, तो बच्चा पूरी तरह अकेला पड़ जाता है।
डॉक्टर अखिल अग्रवाल: यह बहुत गंभीर समस्या है और यह संकट आने वाले 10-20 सालों में और ज़्यादा स्पीड से बढ़ेगा। आज के समय में अधिकांश परिवारों में केवल एक ही बच्चा (Single Child) होने का चलन है। इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में समाज से चाचा, मामा, मौसी जैसे रिश्ते ही खत्म हो जाएंगे।
अमिता शर्मा (पत्रकार): जी, ये रिश्ते बच्चों के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह होते थे।
डॉक्टर अखिल अग्रवाल: बिल्कुल, आज बच्चे बड़े शहरों में अकेले रह रहे हैं, दादा-दादी का प्रभाव खत्म हो चुका है, पैरेंट्स के पास भागदौड़ के कारण बच्चों से संवाद करने का समय नहीं है।
ऐसे में बच्चों के पास अपनी भावनाएं व्यक्त करने या इमोशनली खुद को स्टेबल करने का कोई ज़रिया नहीं बचता। वे खुद ही सीख रहे हैं, खुद ही गलतियों से एक्सपेरिमेंट कर रहे हैं। हमारे बच्चे आज अपनी एंजायटी के साथ-साथ अपने पैरेंट्स की एंजायटी का भी शिकार हो रहे हैं, जिससे वे डबल दबाव में जी रहे हैं।
भाग 5: स्पोर्ट्स अकादमियों का कड़वा सच और सिस्टम की पॉलिटिक्स
अमिता शर्मा (पत्रकार): सर, मानसिक तनाव का यह दायरा सिर्फ घरों तक सीमित नहीं है। अगर हम खेल जगत (Sports Academies) की बात करें, तो वहाँ की स्थिति भी बहुत भयानक है। देश की बड़ी स्पोर्ट्स अकादमियों में जो बच्चियां बहुत अच्छा परफॉर्म करती हैं, उन्हें आगे बढ़ने से रोकने के लिए नेपोटिज़्म (भाई-भतीजावाद), इंटरनल पॉलिटिक्स और यहाँ तक कि सेक्शुअल हैरेसमेंट (यौन उत्पीड़न) तक का सामना करना पड़ता है। ओलंपिक स्तर तक जाने की क्षमता रखने वाली बच्चियों का करियर और मानसिक स्थिति इस सिस्टम के कारण तबाह कर दी जाती है। आखिर ऐसा क्यों?
डॉक्टर अखिल अग्रवाल: खेल अकादमियों और इस पूरे सिस्टम के पीछे भी एन नंबर ऑफ फैक्टर्स (अनेक कारण) ज़िम्मेदार हैं। हमारे सिस्टम में यह एक बड़ी कमी है कि कई बार जो वास्तव में योग्य (Eligible) कैंडिडेट या एथलीट होते हैं, वे अंदर की पॉलिटिक्स और भाई-भतीजावाद के कारण आगे नहीं आ पाते। हमारे देश का प्रशासनिक और संस्थागत ढांचा ऐसा बन चुका है कि उसमें सुधार की प्रक्रिया बहुत जटिल है। जब तक हर स्तर पर कड़े फैसले लेने वाले और निष्पक्ष लीडर्स सामने नहीं आएंगे, तब तक हमारे युवाओं और खिलाड़ियों को इस तरह के मानसिक शोषण का सामना करना पड़ता रहेगा।
भाग 6: मौजूदा शिक्षा प्रणाली (Education System) में मूलभूत बदलाव की ज़रूरत
अमिता शर्मा (पत्रकार): सर, इन सब समस्याओं की जड़ कहीं न कहीं हमारी मौजूदा शिक्षा प्रणाली (Education System) में भी है। आपको नहीं लगता कि हमारा एजुकेशन सिस्टम बच्चों को केवल रटना और एक ही भेड़चाल में दौड़ना सिखाता है?
डॉक्टर अखिल अग्रवाल: बिल्कुल, हमारे देश की मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में आमूल-चूल (मूलभूत) परिवर्तन की सख्त ज़रूरत है। हमारा सिस्टम आज भी काफी हद तक उसी पुरानी सोच पर चल रहा है, जहाँ बच्चों को केवल ‘नौकरी या मज़दूरी’ करने की मानसिकता सिखाई जाती है, न कि उन्हें नए आइडियाज डेवलप करना या स्वतंत्र रूप से सोचना सिखाया जाए। हम बच्चों के मन में यह बात डाल देते हैं कि एक तय परीक्षा को पास करना ही जीवन की एकमात्र सफलता है। हम उन्हें यह नहीं सिखाते कि व्यावहारिक ज्ञान (Practical Knowledge) और हुनर (Skill) क्या होता है।
अमिता शर्मा (पत्रकार): जी, दुनिया के कई देशों में स्कूल स्तर से ही बच्चों की रुचि के हिसाब से उनका career path तय कर दिया जाता है, जिससे उनपर मानसिक बोझ नहीं रहता।