Interview – Shri VK Jaiswal

#कोटा कोचिंग मॉडल: विकास, चुनौतियाँ और सुधार की दिशा
वाइब्रेंट अकादमी के डायरेक्टर श्री वी. के. जायसवाल से विशेष बातचीत


साक्षात्कारकर्ता: अमिता शर्मा, स्वतंत्र पत्रकार

भूमिका

कोटा वर्षों से देश की प्रतियोगी परीक्षा तैयारी का सबसे बड़ा केंद्र रहा है। लाखों विद्यार्थियों ने यहाँ से तैयारी कर अपने सपनों को साकार किया है। लेकिन बदलते समय के साथ कोचिंग मॉडल के सामने कई नई चुनौतियाँ भी उभरकर आई हैं—छात्रों का बढ़ता मानसिक दबाव, स्कूली शिक्षा का कमजोर होना, कम उम्र से शुरू होने वाली कोचिंग संस्कृति और करियर चयन को लेकर असंतुलित दृष्टिकोण।
इन्हीं विषयों पर विस्तार से चर्चा करने के उद्देश्य से स्वतंत्र पत्रकार अमिता शर्मा ने वाइब्रेंट अकादमी, कोटा के डायरेक्टर श्री वी. के. जायसवाल से विस्तृत बातचीत की।

बातचीत की शुरुआत में अमिता शर्मा ने श्री जायसवाल से कहा—
“कोटा ने देश को लाखों सफल विद्यार्थी दिए हैं, लेकिन समय के साथ इस मॉडल के सामने नई चुनौतियाँ भी खड़ी हुई हैं। हम आपके वर्षों के अनुभव का लाभ उठाना चाहते हैं। आपके अनुसार कोटा के कोचिंग मॉडल में ऐसे कौन-से सुधार आवश्यक हैं, जिनसे इसकी गुणवत्ता, विश्वसनीयता और छात्र-केंद्रित दृष्टिकोण को और अधिक सुदृढ़ बनाया जा सके? विशेष रूप से, किन बिंदुओं पर कार्य करके इसे भविष्य के लिए अधिक प्रभावी, संतुलित और मानसिक रूप से स्वस्थ शिक्षा मॉडल बनाया जा सकता है?”

श्री वी. के. जायसवाल ने अपने अनुभव के आधार पर निम्नलिखित महत्वपूर्ण विचार साझा किए:

मुख्य विचार एवं विश्लेषण

1. प्रारंभिक कोचिंग मॉडल की विशेषताएँ
श्री जायसवाल के अनुसार, प्रारंभिक वर्षों में कोचिंग संस्थानों में प्रवेश पारदर्शी चयन प्रक्रिया के माध्यम से होता था। केवल योग्य और तैयार विद्यार्थियों को ही प्रवेश दिया जाता था। विद्यार्थियों के प्रदर्शन पर नियमित निगरानी रखी जाती थी और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें चेतावनी पत्र (कंसर्न लेटर) जारी किए जाते थे। इससे छात्रों में अनुशासन और आत्म-जिम्मेदारी की भावना बनी रहती थी।

2. फाउंडेशन कोचिंग (बुनियादी कोचिंग) पर पुनर्विचार
उन्होंने स्पष्ट किया कि छठी और सातवीं कक्षा से शुरू होने वाली फाउंडेशन कोचिंग पर गंभीरता से पुनर्विचार होना चाहिए:
बचपन का प्रभावित होना: कम उम्र में अत्यधिक प्रतियोगी दबाव बच्चों के स्वाभाविक बचपन को छीन लेता है।
मानसिक थकान: कई विद्यार्थी 11वीं और 12वीं कक्षा तक पहुँचते-पहुँचते मानसिक रूप से थक जाते हैं।

ऊर्जा की कमी: कठिन प्रतियोगी परीक्षा निकाल लेने के बाद भी अनेक छात्र उच्च शिक्षा में पहुँचकर अपनी वास्तविक रुचि और ऊर्जा खो देते हैं।

3. एप्टीट्यूड (अभिक्षमता) आधारित करियर चयन
श्री जायसवाल का मानना है कि प्रत्येक विद्यार्थी की क्षमता अलग होती है:
हर विद्यार्थी केवल डॉक्टर, इंजीनियर या खिलाड़ी ही नहीं बन सकता; सबकी अपनी अलग क्षमताएँ और रुचियाँ होती हैं।

करियर का चुनाव केवल सामाजिक अपेक्षाओं के आधार पर नहीं, बल्कि विद्यार्थी की व्यक्तिगत रुचि, योग्यता और एप्टीट्यूड के अनुसार होना चाहिए।

4. स्कूली शिक्षा का महत्व
उन्होंने नियमित स्कूली शिक्षा को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। विद्यालय केवल पाठ्यक्रम पूरा करने का माध्यम नहीं है, बल्कि वहीं से विद्यार्थी में संवाद कौशल, व्यक्तित्व विकास, नेतृत्व क्षमता, सामाजिक व्यवहार और जीवन कौशल विकसित होते हैं।
उन्होंने चिंता व्यक्त की कि इंटीग्रेटेड (एकीकृत) स्कूल-कोचिंग मॉडल के बढ़ते प्रभाव ने विद्यालयों की वास्तविक भूमिका को काफी हद तक सीमित कर दिया है।

5. मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता
श्री जायसवाल ने कहा कि केवल रैंक और अंकों पर आधारित वातावरण विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

विद्यार्थियों को प्रतिदिन खेल, व्यायाम अथवा किसी शारीरिक गतिविधि के लिए समय अवश्य निकालना चाहिए।
मानसिक संतुलन, शारीरिक स्वास्थ्य और अध्ययन—इन तीनों का संतुलन ही दीर्घकालीन सफलता का असली आधार है।
6. शिक्षक और विद्यार्थी की भूमिका
उन्होंने स्पष्ट किया कि सफलता का सबसे बड़ा आधार विद्यार्थी की अपनी मेहनत होती है:
लगभग 90 प्रतिशत सफलता विद्यार्थी के स्वयं के प्रयासों पर निर्भर करती है।

शिक्षक का 10 प्रतिशत योगदान सही दिशा दिखाने, रणनीति बनाने और मार्गदर्शन देने में होता है।

भविष्य के लिए प्रमुख सुझाव
फाउंडेशन कोचिंग की समीक्षा: प्राथमिक एवं पूर्व-माध्यमिक स्तर पर कोचिंग के दबाव को कम किया जाए।

करियर काउंसलिंग: विद्यार्थियों के लिए एप्टीट्यूड टेस्टिंग और करियर काउंसलिंग (मार्गदर्शन) की व्यवस्था को मजबूत बनाया जाए।

नियमित स्कूली शिक्षा: 11वीं और 12वीं कक्षा तक नियमित स्कूल शिक्षा को प्रोत्साहित किया जाए।
मानसिक स्वास्थ्य परामर्श: प्रत्येक विद्यालय और कोचिंग संस्थान में प्रशिक्षित काउंसलर उपलब्ध कराए जाएँ।
संतुलित दृष्टिकोण: शिक्षा का उद्देश्य केवल रैंक हासिल करना नहीं, बल्कि संतुलित व्यक्तित्व, जीवन कौशल और समग्र विकास होना चाहिए।

निष्कर्ष

बातचीत के अंत में श्री वी. के. जायसवाल ने इस बात पर बल दिया कि कोटा मॉडल ने देश को उत्कृष्ट परिणाम दिए हैं, लेकिन बदलते समय के साथ इसमें सुधार की सख्त आवश्यकता है। यदि शिक्षा व्यवस्था में छात्र की मानसिक भलाई, व्यक्तित्व विकास, शारीरिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत क्षमता को समान महत्व दिया जाए, तो कोटा भविष्य में भी देश के लिए एक प्रेरणादायक और विश्वसनीय शिक्षा मॉडल बना रह सकता है।

इंटरव्यू गेस्ट:

श्री वी. के. जायसवाल
डायरेक्टर, वाइब्रेंट अकादमी, कोटा
साक्षात्कारकर्ता:
अमिता शर्मा
स्वतंत्र पत्रकार

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